🌀 ऐ सखि ! 🌀
— अमीर खुसरो
रात समय वह मेरे आवे ।भोर भए वह घर उठि जावे ।।
यह अचरज है सबसे न्यारा । ऐ सखि साजन ? ना सखि तारा ।।
वह आवे तब शादी होय । उस दिन दूजा और न कोय ।।
मीठे लागे वाके बोल । ऐ सखि साजन ? ना सखि ढोल ।।
जब माँगू तब जल भरी लावे । मेरे मन की तपन बुझावे ।
मन का भारी तन का छोटा । ऐ सखि साजन ? ना सखि लोटा ।।
बेर-बेर सोवतहि जगावे । ना जागू तो काटे- खावे ।।
व्याकुल हुई मैं हक्की-बक्की । ऐ सखि साजन ? ना सखि मक्खी ।।
अति सुरंग है रंग रँगीलो । है गुणवंत बहुत चटकीली ।।
राम भजन बिन कभी न सोता । क्यों सखि साजन ? ना सखि तोता ।।
अर्धनिशा वह आयो भौन । सुंदरता भरने कवि कौन ।।
निरखत ही मन भयो आनंद । क्यों सखि साजन ? ना सखि चंद ।।
शोभा सदा बढा़वन हारा । आँखिन से छिन होत न न्यारा ।।
आठ पहर मेरो मनरंजन । क्यों सखि साजन ? ना सखी अंजन ।।
जीवन सब जग जासों कहै । वा बीन नेक न धीरज रहै ।।
हरै छिनक में हिय की पीर । क्यों सखि साजन ? ना सखि नीर ।।
बिना आए सबहीं सुख भूले । आए ते अँग अँग सब फूले ।।
सीरा भई लगावत छाती । क्यों सखि साजन ? ना सखि पाती ।।

0 Comments
अगर आपके दिल में कोई भी सवाल हो तो तुरंत Comment करके पूछ लीजिए।